प्रतीक्षा
इंतज़ार
कभी सब्र से, कभी बेसब्री से प्रिय के इंतज़ार का भाव।
इंतज़ार भी क्या अजीब रिश्ता है,
न मिलो तो सांस अटकती है, मिलो तो वक्त फिसलता है।
दरवाज़े पर आहट हो या दिल में कोई पुकार,
हर आवाज़ में तेरा ही नाम निकलता है।
मैंने सब्र को भी तेरी राह पर बैठा देखा है,
और बेसब्री को तेरे ख़याल से लिपटा देखा है।
तुम आओ तो ये शाम मुकम्मल हो जाए,
वरना चाँद भी आज आधा लगता है।