निगाहें
जुल्फों की छांव
जुल्फ़ों, नज़ाकत और आकर्षण में डूबा प्रेम।
तेरी जुल्फों की छांव में शाम उतर आती है,
धूप भी तेरे पास आकर नरम पड़ जाती है।
एक लट जब चेहरे से खेलती है,
मेरी कविता वहीं से जन्म लेती है।
निगाहें झुकें तो सादगी लगती है,
उठें तो पूरी कायनात सजती है।
तेरी नज़ाकत का क्या बयान करूँ,
हर उपमा तेरे आगे छोटी लगती है।